Tuesday, April 28, 2009

कसक

मुझे साँस नहीं
तुम्हारी साँसों की ज़रुरत है
मेरा हाल ना पूछो
कभी मेरे लिये ही मुस्कुरा दो तो खुशी होगी
मेरे शब्दों से अर्थ तो निकालने लगे हो
उनके मायिने तो बदले नहीं..हाँ, तुम समझे नहीं तो सब निरर्थक होगा
वक्त बीतता जा रहा है
आयिने में अक्स तुम्हारा अब भी दिखता नहीं
हाथों में हाथ महसूस हों ना हों
एक रूह छू देने वाला खयाल कह दो, होगा काफी वही
खवाब देख देख ज़िन्दगी कटती नहीं
पर सपनों में भी आरज़ू पूरी होती है कभी?
जीने लगी हूँ खुद ही
तो ये क्या, प्यार में पिघलने लगे वो भी..?!
जो माँगो वो मिलता नहीं
और बिन माँगे भी मिलता है सभी
शायद सब्र का नाम ज़िन्दगी
और सब्र करके जो मिले मीठा फल वही
तुम्हारी चाहत दिल में कम होती नहीं
कभी प्यार करोगे हमसे भी तुम उतना ही
प्यार होता पाने का ही नाम नहीं
प्यार दिल में करते रहे, किया ज़ायर नहीं
पल पल साथ हो मेरे
फिर भी ये कसक है कि जाती ही नहीं..

2 comments:

रवि रतलामी said...

मुहब्बत से लबरेज, प्यार भरी, प्यारी सी कविता है.

Chhiyaishi said...

बहुत शुक्रिया..