Thursday, February 12, 2009

कभी सोचा है तुमने..

एक झिड्क तुम्हारी, क्या असर कर जाती है
नाज़ुक से दिल पे मेरे, एक एक घाव अभी भी बाकी है
और कहाँ एक नज़र तुम्हारी, प्यार से मेरी ओर पलटी है
बुझे से मेरे दिन को, रोशन रोशन किये है
एक ख्वाहिश भी तुम्हारी, जो कभी ज़ायर हुई है
तो सूरज से भी सुनहरा वर्णु उतार लाने की इच्छा हुई है
एक झलक पे तुम्हारी, लोगों ने जान देने कि बातें करी हैं?
हमें हर पल में सौ सौ बार मरके भी साथ जीने की ख्वाहिश् हुई है
भावुक तो हो, कुछ कह पाने में मुश्किल तुम्हें है
कम बोलती थी,प्यार में तुम्हारी ज़ुबान बनने की चाहत हुई है
एक दीवार से कई बार अन्धेरे में भिड जाती हूँ, बहुत चोट पायी है
चाँद को उस पार देखकर्, दीवाने दिल का रुक पाना भी मुश्किल है
एक नहीं हज़ार उपमायें मिली होगीं तुम्हें, नहीं?
किस चीज़ कि तारीफ पहले हो, इस उधेड्बुन से निकलने की कोशिशें हैं
एक बढाई भी चुन लूँ उन सभी में, तो कम मुश्किल नहीं है
तुम ही ने कहा, तुम्हें पसंद नहीं है..
एक मुस्कुराहट के लिये तुम्हारी, क्या क्या किया है
सर से पाँव तक बदल चुकी हूँ, क्या कोई मुझे अब भी पहचानता है?
एक पुरानी मीठी-शब्द्-लकीर पे तुम्हारी, गेहरा विशवास हुआ है
बाद के खुरदुरे रासतों को भी,'ज़िन्दगी के उतार्-चढाव्' करार दिया है
इच्छा है कि भीड से अलग बनो, तुम्हारे साथ चलने की दरकार है
एक दिन के लिये ही सही, आसमाँ मुझपे वो नूर बख्शे
प्यार तो है तुम्हें, पर उसे देख पगलों सा हो जाये!

Tuesday, February 3, 2009

खोयी सी हूँ

नज़र पड्ते ही तुम्हारी
सिमट सी जाती हूँ
आँखें झुकी जाती हैं
बन्द करके ईशवर से
कुछ और पल का साथ माँगती हूँ.