Monday, October 20, 2008

फूलों के लम्बे केसरों पर लगे रजकण..


अब मुशकिल है तुम्हे देख पाना, फिर मिलने की आरजू भी नहीँ. एक छोटे से वाक्ये ने कितना कुछ बदल डाला है. लो आज एक दुख से ही चोट को आराम आया है.

2 comments:

राजीव थेपड़ा ( भूतनाथ ) said...

भारी चोट से हलकी चोट से का दर्द जता रहता है...है ना......... कहते हैं ना.......ये चोट है....उस चोट का मरहम.....................

Anonymous said...

aapne sahi kaha..yeh pal kuch aisa hi tha....